96 करोड़ 90 लाख : यह उन मतदाताओं की संख्या है, जो मौजूदा लोकसभा चुनावों में मतदान के लिए पंजीकृत हैं। यह अमेरिका की जनसंख्या की लगभग तीन गुना और यूके की जनसंख्या की चौदह गुना है! दुनिया का यह सबसे बड़ा चुनाव दुनिया खासकर विकासशील देशों के लिए एक मिसाल की तरह है। जब 1947 में भारत को आजादी मिली थी और 1950 में उसका संविधान लागू हुआ था, तब राजनीतिक-विश्लेषकों को चिंता हुई कि भारत के आकार, विविधता और सामाजिक-आर्थिक स्थिति को देखते हुए क्या लोकतंत्र का प्रयोग वहां सफल होगा? क्या वहां निरंकुशता या तानाशाही नहीं कायम हो जाएगी? लेकिन समय के साथ भारत के लोगों ने इन अंदेशों को झुठला दिया। पाकिस्तान का ही उदाहरण लें, जिसका निर्माण एक स्वतंत्र देश के रूप में भारत के साथ ही हुआ था। 1958 में वहां लोकतांत्रिक सरकार का पहला तख्तापलट हुआ था। तब से, सेना ही वहां पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से नियंत्रण रखती आ रही है। इस्लामाबाद में लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित किसी भी नेता ने अपना कार्यकाल पूरा नहीं किया है। म्यांमार में भी- जहां 1948 में लोकतंत्र स्थापित हुआ- प्रतिनिधि लोकतंत्र 1962 तक ही कायम रहा। उसके बाद वहां भी सेना ने तख्तापलट कर सत्ता पर कब्जा कर लिया। इसकी तुलना में भारत का लोकतंत्र उल्लेखनीय रूप से लचीला रहा है। लेकिन यह केवल संयोग ही नहीं है। भारत के संविधान-निर्माताओं, विशेष रूप से बीआर आम्बेडकर ने यह सुनिश्चित किया था कि राज्य की विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका की अच्छी तरह से परिभाषित भूमिकाएं हों और वे एक-दूसरे पर प्रभावी नियंत्रण रख सकें। संविधान ने चुनावों को गैर-पक्षपातपूर्ण तरीके से संचालित करने के लिए चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं का भी निर्माण किया। हमारे संस्थानों के टिके रहने और सफल होने का एक कारण यह है कि भारत में नेताओं ने अपनी सीमाओं को स्वीकार किया है और अदालतों, चुनाव आयोग और आरबीआई जैसे स्वतंत्र संस्थानों के आदेशों का सम्मान किया है। जब नेताओं ने लोकतंत्र की मर्यादा लांघने की कोशिश की- जैसा कि इंदिरा गांधी ने 1975 में आपातकाल लागू करने के बाद किया था- तो मतदाताओं ने चुनावों में नेताओं को नकार दिया। राज्यों में भी भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरुपयोग पर चुनावों में प्रतिकूल प्रतिक्रिया की जाती है। भारत के मतदाता मिलकर सरकार को जवाबदेह ठहराने में प्रमुख भूमिका निभाते हैं। लेकिन मौजूदा लोकसभा चुनाव के दूसरे चरण में मतदान 2019 की तुलना में 7% कम था। यह एक चिंताजनक संकेत है और चुनावी प्रक्रिया से मतदाताओं के अलगाव को दर्शाता है। यह भाजपा के मतदाताओं में चली आई आत्मसंतुष्टि की ओर भी संकेत करता है, जो प्रधानमंत्री मोदी के तीसरे कार्यकाल को लेकर आश्वस्त हैं। हालांकि, इसका एक और पहलू यह भी है कि 2023 में, प्यू रिसर्च सेंटर ने भारतीय मतदाताओं का एक सर्वेक्षण किया था, जिसमें पता चला था कि 85% लोगों ने भारत में सैन्य शासन या निरंकुश नेता का समर्थन किया था। शासन के अच्छे तरीके के रूप में लोकतंत्र के समर्थन में गिरावट देखी गई। अगर मतदाता लोकतांत्रिक प्रक्रिया में अपना विश्वास खो रहे हैं तो यह भारत के लोकतंत्र और भविष्य के लिए चिंताजनक संकेत है। इससे निर्वाचित नेता भी जनता के प्रति जवाबदेही से मुक्त होने लगेंगे। भारत के मतदाताओं को समझना चाहिए कि पिछले सत्तर वर्षों में देश की सफलता उसके लोकतंत्र की सफलता पर ही आधारित रही है। यही बात उसे विदेशी निवेश के लिए एक आकर्षक मुकाम बनाती है। अपनी लोकतांत्रिक साख के कारण ही भारत को चीन का महत्वपूर्ण विकल्प समझा जाता है। उस साख में किसी भी तरह की गिरावट का असर भारत की अर्थव्यवस्था और दुनिया के साथ उसके संबंधों- दोनों पर पड़ सकता है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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