1991 के लोकसभा चुनाव की बात है। इटावा में जबरदस्त हिंसा हो गई। मारपीट और लूट की घटनाएं हुईं। फिर क्या था, चुनाव आयोग ने इलेक्शन रद्द कर दिया। इटावा में चुनाव की तारीख बदल दी गई। उपचुनाव की घोषणा के बाद इटावा में कांशीराम को मिलाकर 48 उम्मीदवार उतर गए। यह इटावा में अब तक के चुनाव का रिकॉर्ड था। पार्टी मीटिंग में जब चर्चा हुई तो कांशीराम मुस्कराए, बोले- यह लोकतंत्र है। अच्छा ही है कि मैं इतने लोगों को हराऊंगा। उपचुनाव हुए और कांशीराम ने इटावा सीट जीत ली। कांशीराम पहली बार सांसद बन गए। जीत के जश्न के दौरान कांशीराम ने अपने साथी कार्यकर्ताओं से पूछा- हां, तो बताइए कितने प्रत्याशियों की जमानत जब्त हुई? इटावा की जीत के बाद मुलायम सिंह यादव और कांशीराम साथ आ गए। कांशीराम ने मुलायम को नई पार्टी बनाने का सुझाव दिया और मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी बनाई। दैनिक भास्कर की स्पेशल सीरीज ‘चुनावी किस्सा’ आज जानेंगे 33 साल पहले हुए लोकसभा चुनाव के बारे में… ‘मिले मुलायम-कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्रीराम’ यूपी की सियासत में कांशीराम और मुलायम सिंह यादव के गठबंधन के बाद यह नारा जोर-शोर से चल रहा था। इस गठबंधन की नींव 1991 के लोकसभा चुनाव से रखी गई थी। दलितों के लिए पॉलिटिक्स में उतरे कांशीराम ने 1984 में बसपा बनाई। पहली बार 1984 के लोकसभा चुनाव में पार्टी के प्रत्याशी उतारे। इस चुनाव में बसपा को हार का सामना करना पड़ा। तब कांशीराम ने कहा था, उनकी बहुजन समाज पार्टी पहला चुनाव हारने के लिए, दूसरा नजर में आने ले लिए और तीसरा चुनाव जीतने के लिए लड़ेगी। इसके बाद कांशीराम ने यूपी का रुख किया। 1988 में पीएम वीपी सिंह के खिलाफ इलाहाबाद से लोकसभा चुनाव लड़ा। लेकिन 70 हजार वोटों से चुनाव हार गए। कांशीराम चुनाव तो हार रहे थे, लेकिन उनके भाषण का असर देखने को मिल रहा था। बसपा का जनाधार भी तेजी से बढ़ रहा था। चुनावी नतीजों से कांशीराम को एक बात समझ में आ रही थी कि यूपी में बसपा अच्छा प्रदर्शन कर रही है। यही वजह थी कि कांशीराम ने 1991 में इटावा से चुनाव लड़ने का फैसला किया। पंजाब से इटावा आते थे कांशीराम
कांशीराम के चुनावी एजेंट रहे खादिम अब्बास कहते हैं- भरथना विधानसभा से विधायक रहे प्रोफेसर सहदेव सिंह यादव उस समय दिग्गज नेता माने जाते थे। वह कांशीराम जी के राजनीतिक गुरु भी थे। कांशीराम पंजाब से चलकर इटावा आते थे और उनसे सियासी चर्चा करते थे। प्रोफेसर सहदेव ने भी कांशीराम को चुनाव लड़ने की हरी झंडी दे दी थी। खादिम अब्बास ने कहा- उन दिनों कांशीराम जी और सहदेव जी ने जो नारे दिए, उनसे यूपी की सियासत की हवा बदल गई। उन दिनों नारे थे- ’15 लूट कर रहे खासी, जागो-जागो प्रत्याशी, वोट हमारा-राज तुम्हारा नहीं चलेगा, अब तुम्हारा शासन नहीं चलेगा’। हमने जोर-शोर से तैयारी की, इटावा जीतना था
खादिम अब्बास ने कहा- इटावा की जनता का मूड भांपना किसी के बस की बात नहीं। इसका अंदाजा 1957 के चुनावी नतीजों से लगाया जा सकता है। यहां कांग्रेस की तूती बोलती थी। लेकिन चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी कमांडर अर्जुन सिंह भदौरिया ने कांग्रेस प्रत्याशी को हरा दिया था। चूंकि मैं कांशीराम जी का चुनाव में एजेंट था, तो पिछले सारे समीकरणों को भी खंगाला जा रहा था। उन दिनों हमारी रणनीति साफ थी कि इटावा जीतना है। बसपा ने देश की 200 से ज्यादा सीटों पर कैंडिडेट उतारे। कांशीराम जी का पूरा फोकस इटावा में था। वह साइकिल से प्रचार करने निकलते थे। हमारी साइकिल भी उनके पीछे चलती। नीले रंग से रंग दी गई थी गाड़ी
खादिम अब्बास ने कहा- कांशीराम जी को नीला रंग सबसे ज्यादा पसंद था। उनके पास कंटेसा गाड़ी थी। उन्होंने अपनी गाड़ी को नीले रंग से पुतवा दिया था। चुनाव का समय पास आ गया था। लेकिन, ऐन वक्त इटावा में हिंसा हो गई। हालात बिगड़ गए। सभी पार्टियां चुनाव आयोग पहुंच गईं। आरोप लगाया गया कि बूथ कैप्चरिंग हुई है। तब करीब 9 प्रत्याशी चुनावी मैदान में थे। उपचुनाव की घोषणा की गई। हम भी राजी थे कि चुनाव पाक-साफ हो। हमारी तैयारी पूरी थी। जगह-जगह चौपाल लगाते और जनता के मुद्दों को लिखते। तब सपा थी नहीं, मुलायम सिंह की सजपा से राम सिंह उतरे
खादिम अब्बास ने बताया- उपचुनाव में 48 उम्मीदवार उतर गए। मुलायम सिंह समाजवादी जनता पार्टी में थे। उनकी पार्टी से राम सिंह शाक्य उतरे थे। भाजपा से लाल सिंह वर्मा ने नामांकन भरा। इसके अलावा कांग्रेस से शंकर तिवारी थे। नेशनलिस्ट और दूरदर्शी पार्टी को भी जोड़ दिया जाए, तो कुल 6 पार्टियां चुनावी मैदान में थीं। 42 कैंडिडेट निर्दलीय उतरे थे। 44 प्रत्याशियों की जमानत जब्त हुई
खादिम अब्बास ने कहा- चुनाव से पहले ही कांशीराम जी ने कह दिया था कि यह रिकॉर्ड बनेगा। मेरे खिलाफ इतने उम्मीदवार उतरे हैं, यह अच्छा ही है। हुआ भी यही। कांशीराम जी को एक लाख 45 हजार वोट मिले। उन्होंने 22 हजार वोटों से भाजपा के लाल सिंह वर्मा को हरा दिया। लाल सिंह को 1 लाख 21 हजार वोट मिले थे। तीसरे नंबर पर सजपा के राम सिंह शाक्य को 81 हजार के करीब वोट मिले। 33 प्रत्याशी ऐसे रहे, जो तीन अंकों की डिजिट तक सीमित रहे। रिजल्ट वाले दिन जब कांशीराम और हम सभी जश्न मना रहे थे। तब उन्होंने पूछा कि कितनों की जमानत जब्त हुई। हम सभी एक स्वर में बोले- जी 44। खादिम बताते हैं कि उस चुनाव का रिकॉर्ड अब तक नहीं टूटा। 1996 में 35 प्रत्याशी जरूर उतरे थे। सबसे कम 3 प्रत्याशी 1952 के चुनाव में थे। (इनपुट सहयोगी- उवैस चौधरी, इटावा) 1.कल्याण सिंह की रैली, 2 घंटे बाद सरकार गिर गई:मुलायम के खिलाफ उनके शिष्य डीपी यादव को उतारा, अफसरों को गर्दन नापने की धमकी दी 2. जब खून से बनी तस्वीर देख भावुक हुईं इंदिरा गांधी:बोलीं- हम हारे हैं, तो जीतेंगे भी; इस हुंकार ने दिलाई उपचुनाव में जीत 3. जब कट्टर विरोधी मुलायम-कल्याण ने हाथ मिलाया:नेताजी ने मुस्लिमों से माफी मांगी, कहा-मस्जिद गिराने के जिम्मेदारों का साथ नहीं देंगे 4. जब लालू बुआ से मिलने पहुंचे अटल:बोलीं- बड़े दिन बाद आए अटलू? जवाब दिया- यहां गड्ढे में सड़क है इसलिए देर हुई 5. जब पंडित नेहरू ने चमगादड़ों को डांट दिया:बोले-कीप साइलेंस, पहले अपनी बात कह लूं, फिर आपकी सुनेंगे 6. मुलायम ने ही कार्यकर्ताओं से अपनी मौत की मुनादी करवाई:शादी से लौटते समय हुआ था हमला; बोले- कह दो नेताजी मर गए 7. यूपी के मुख्यमंत्री, जिन्हें पुलिस 2 घंटे ढूंढती रही:पीएम आवास में उन्हें कोई पहचान नहीं सका; परिचय कराना पड़ा-यही हैं अगले सीएम

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