बात 1998 के लोकसभा चुनाव की है। कल्याण सिंह मुख्यमंत्री थे। सपा-बसपा मिलकर भाजपा की सरकार को गिरा देना चाहती थीं। मायावती एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करके ऐलान कर देती हैं कि कल्याण सिंह की सरकार गिर चुकी है। सिर्फ 4 घंटे के अंदर कल्याण सिंह मुख्यमंत्री पद से हटा दिए जाते हैं। कल्याण की कैबिनेट के मंत्री जगदंबिका पाल यूपी के नए सीएम चुने जाते हैं। इस साजिश के बाद अटल बिहारी वाजपेयी अनशन पर बैठ गए। रात 10 बजे जगदंबिका पाल को शपथ दिलाई जाती। लेकिन 31 घंटे के अंदर ही उन्हें सीएम पद से हटा दिया जाता है, कल्याण सिंह फिर कमबैक करते हैं। कैसे यह पूरी स्क्रिप्ट लिखी गई? यूपी को कम समय के लिए मिले सीएम ने क्या कुछ किया? दैनिक भास्कर की स्पेशल सीरीज चुनावी किस्सा में जानिए… यूपी की सियासत में बड़ी साजिश की शुरुआत मायावती की प्रेस कॉन्फ्रेंस से होती है। 21 फरवरी को दोपहर 12 बजे लखनऊ में मीडिया का जमावड़ा था। मायावती ऐलान करती हैं कि अब कल्याण सिंह की सरकार के पास बहुमत नहीं है। वह मुख्यमंत्री पद छोड़ दें। कुछ देर बाद मुलायम सिंह यादव भी प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाता है। वो कहते हैं- अगर मायावती भाजपा की सरकार को गिराने के लिए तैयार हैं, तो वो भी पीछे नहीं हटेंगे। 23 फरवरी को यूपी की कई सीटों पर वोटिंग होनी थी। प्रचार का आखिरी दिन था। कल्याण सिंह संभल में डीपी यादव के लिए चुनावी सभा कर रहे थे। जैसे ही उन्हें राजनतिक षड्यंत्र का पता चला, वह सभी कार्यक्रम रद्द करके लखनऊ रवाना हो जाते हैं। विधायकों के साथ मायावती पहुंची थी राजभवन
इधर, करीब 2 बजे मायावती अपने विधायकों के साथ राजभवन पहुंच जाती हैं। उनके साथ अजीत सिंह की भारतीय किसान कामगार पार्टी, जनता दल और लोकतांत्रिक कांग्रेस के भी विधायक थे। उस समय यूपी के राज्यपाल रोमेश भंडारी थे। मायावती ने राज्यपाल से अपील करते हुए कहा- कल्याण सिंह की कैबिनेट को तुरंत बर्खास्त किया जाए। अब उन्होंने अपना बहुमत खो दिया है। जगदंबिका पाल उनके विधायक दल के नेता होंगे। इन्हीं को मुख्यमंत्री पद के लिए शपथ दिलाई जाए। उन दिनों जगदंबिका पाल कल्याण सिंह सरकार में यातायात मंत्री थे। वह लोकतांत्रिक कांग्रेस के नेता और बस्ती से विधायक थे। 1996 विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 174 सीटें जीती थीं। सपा को 110 सीटें और बसपा के पास 67 सीटें थीं। इसके अलावा कांग्रेस, जनता दल और लोकतांत्रिक कांग्रेस के पास 73 सीटें थीं। मायावती और लोकतांत्रिक कांग्रेस ने कल्याण सिंह को समर्थन दे रखा था। और बर्खास्त हो गई कल्याण सिंह की सरकार
मायावती से मुलाकात के बाद रोमेश भंडारी ने कल्याण सिंह की सरकार को बर्खास्त कर दिया। शाम 5 बजे के करीब कल्याण सिंह राजभवन पहुंच गए। उन्होंने बहुमत साबित करने की अपील भी की। लेकिन, रोमेश भंडारी ने कल्याण सिंह को विधानसभा में बहुमत सिद्ध करने का मौका नहीं दिया। इसके पीछे की वजह 5 महीने पहले विधानसभा में हुई घटना थी, जिससे रोमेश भंडारी कल्याण सिंह सरकार से खफा थे। दरअसल, 21 अक्टूबर 1997 को सदन में प्रमोद तिवारी के नेतृत्व में कांग्रेस विधायक विधानसभा अध्यक्ष के आसन के पास पहुंच गए। उन्होंने जबरदस्त तरीके से विरोध किया। इसी दौरान सपा और बसपा के विधायक भी वहां पहुंच गए। सदन में ही हिंसा हो गई। विधायक एक दूसरे पर माइक और कुर्सियों से हमला करने लगे। इसी घटना के बाद रोमेश भंडारी ने राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश केंद्र सरकार से कर दी। मुलायम सिंह यादव उन दिनों केंद्र में मंत्री थे। उन्होंने भी पूरा जोर लगाया। लेकिन गृह मंत्री इंद्रजीत गुप्ता और स्वयं राष्ट्रपति केआर नारायणन ने यूपी में राष्ट्रपति शासन लगाने के लिए समर्थन नहीं दिया। कुल मिलाकर यूपी में राज्यपाल की सिफारिश लागू नहीं हुई। अपनी सरकार बचाने के लिए कल्याण सिंह ने उनको समर्थन देने वाले सभी विधायकों को मंत्री बनाने का फैसला किया। नतीजा ये हुआ कि कल्याण सिंह की कैबिनेट में 94 सदस्य हो गए। इतनी तेजी में सरकार बनी कि राष्ट्रगान तक नहीं बजा
जब कल्याण सिंह की सरकार बर्खास्त होते ही जगदंबिका पाल की ताजपोशी की तैयारी की जाने लगी। यह बहुत तेजी में हुईं। 21 फरवरी की रात 10 बजे जगदंबिका पाल ने यूपी के 17 वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। शपथ ग्रहण समारोह में मायावती समेत कल्याण सिंह के सभी राजनीतिक विरोधी मौजूद रहे। इसके अलावा लोकतांत्रिक कांग्रेस के अध्यक्ष नरेश अग्रवाल ने डिप्टी सीएम के पद पर शपथ ली। कहा जाता है कि उस दिन राज्यपाल ने जगदंबिका पाल को शपथ दिलाने में इतनी तेजी दिखाई कि राजभवन का स्टाफ शपथ ग्रहण समारोह के बाद राष्ट्रगान बजाना ही भूल गया। चुनाव से पहले बिगड़े हालात, अनशन पर बैठे अटल
अगले दिन चुनाव होने थे। लखनऊ में भी वोटिंग थी। कल्याण सिंह की सरकार गिरते ही भाजपा नेताओं ने मोर्चा खोल दिया। राज्यपाल के फैसले के विरोध में 22 फरवरी को दिल्ली में अटल बिहारी वाजपेयी स्टेट गेस्ट हाउस में अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठ गए। जमकर नारेबाजी की जाने लगी। हालात बिगड़ने लगे। इसी दरम्यान भाजपा नेता नरेंद्र सिंह गौड़ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंच गए। उन्होंने राज्यपाल के फैसले के खिलाफ याचिका दायर की। कोर्ट का निर्देश-बहाल हो कल्याण सिंह की सरकार
दायर की गई याचिका पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कल्याण सिंह सरकार को बहाल करने का आदेश जारी कर दिया। इसके बाद जगदंबिका पाल को 31 घंटों के अंदर मुख्यमंत्री के पद से हटना पड़ा। हाईकोर्ट ने कल्याण सिंह को यह भी निर्देश दिए कि वो 3 दिनों के अंदर सदन में विश्वास मत प्राप्त करे। 16 कैमरों की निगरानी, कल्याण को मिले 225 मत
26 फरवरी को कल्याण सिंह सरकार का सख्त निगरानी के बीच फ्लोर टेस्ट हुआ। 16 से ज्यादा वीडियो कैमरे लगाए गए। कल्याण सिंह को बहुमत के लिए 213 विधायक चाहिए थे। उन्हें, 12 अधिक मत मिले। 225 का बहुमत लेकर कल्याण सिंह ने विश्वास मत प्राप्त कर लिया। इधर जगदंबिका पाल को 196 विधायकों का समर्थन प्राप्त हुआ। इसके बाद सिर्फ जगदंबिका पाल को छोड़कर लोकतांत्रिक कांग्रेस के विधायक कल्याण सिंह के साथ हो लिए। उस दिन को याद करते हुए पॉलिटिकल एक्सपर्ट अरविंद जय तिलक बताते हैं- यह यूपी की राजनीति में हुआ एक्सीडेंट कहा जा सकता है। कल्याण सिंह की सरकार गिरने और फिर बनने तक अखबार इसी खबर से पटे थे। जब कोर्ट ने कल्याण सिंह को बहाल करने का निर्देश दिया था, तब वह सीएम ऑफिस पहुंचे। यहां जगदंबिका पाल सीएम की कुर्सी पर बैठे हुए थे। वह हटने को तैयार ही नहीं हुए। जगदंबिका का कहना था कि कोर्ट का निर्णय का लेटर लेकर आओ, तब ही हटेंगे। यह पहला ऐसा मौका था एक नया मुख्यमंत्री और दूसरा बहाल किया गया मुख्यमंत्री आमने-सामने थे। फिर नेताओं के साथ-साथ अधिकारियों के समझाने पर जगदंबिका पाल ने सीएम की कुर्सी छोड़ी। इधर, लखनऊ समेत यूपी की कई सीटों पर चुनाव हो चुके थे। 1999 चुनाव भाजपा ने बना दिया मुद्दा
अरविंद जय तिलक बताते हैं, ‘उन दिनों राज्यपाल रोमेश भंडारी की बड़ी किरकिरी हुई थी। यूपी की इस घटना के बाद भाजपा ने इसे मुद्दा बना दिया। ‘कल्याण वर्सेस जगदंबिका’ को लेकर साथ चले और जनता को मैसेज दिया कि कांग्रेस और विपक्ष भाजपा को हटाने के लिए कुछ भी कर सकती है। लोकतंत्र ने जिसे चुना है, उसके लिए बड़ा षड्यंत्र भी रच सकती है।’ 1. कांशीराम ने 47 प्रत्याशियों को हराया, मुलायम ने सपा बनाई: साइकिल से प्रचार करके पहली बार इटावा से सांसद बने कांशीराम की कहानी 2. जब खून से बनी तस्वीर देख भावुक हुईं इंदिरा गांधी:बोलीं- हम हारे हैं, तो जीतेंगे भी; इस हुंकार ने दिलाई उपचुनाव में जीत 3. जब कट्टर विरोधी मुलायम-कल्याण ने हाथ मिलाया:नेताजी ने मुस्लिमों से माफी मांगी, कहा-मस्जिद गिराने के जिम्मेदारों का साथ नहीं देंगे 4. जब लालू बुआ से मिलने पहुंचे अटल:बोलीं- बड़े दिन बाद आए अटलू? जवाब दिया- यहां गड्ढे में सड़क है इसलिए देर हुई 5. जब पंडित नेहरू ने चमगादड़ों को डांट दिया:बोले-कीप साइलेंस, पहले अपनी बात कह लूं, फिर आपकी सुनेंगे 6. मुलायम ने ही कार्यकर्ताओं से अपनी मौत की मुनादी करवाई:शादी से लौटते समय हुआ था हमला; बोले- कह दो नेताजी मर गए 7. यूपी के मुख्यमंत्री, जिन्हें पुलिस 2 घंटे ढूंढती रही:पीएम आवास में उन्हें कोई पहचान नहीं सका; परिचय कराना पड़ा-यही हैं अगले सीएम

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