“कोविड की तरह, अब हार्ट अटैक भी ए सिंपटोमैटिक यानी बिना लक्षण की बीमारी बन चुकी है। चलते-फिरते, डांस और वर्क आउट करते अचानक से कार्डियक अरेस्ट हो जा रहा। जबकि, सीने में दर्द, घबराहट और पसीना आना इसकी शुरुआती पहचान थी। अब, बिना किसी कार्डियक बीमारी हिस्ट्री के युवा और हेल्दी लोगों को दिल का दौरा पड़ने से तुरंत मौत हो जा रही है। इसके पीछे कोविड की वैक्सीन ही पूरी तरह से जिम्मेदार हैं। क्योंकि, बिना 4 क्लीनिकल टेस्ट और साइड इफेक्ट्स पर स्टडी किए ही अंधाधुंध वैक्सीन लगा दी गई, जबकि कार्डियोलॉजिस्ट के तौर पर मैं इसका विरोध पिछले 3 साल से कर रहा हूं।” ये बातें, BHU अस्पताल के सीनियर कार्डियोलॉजिस्ट और कार्डियोलोजी के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर ओम शंकर ने कही।​​​​​​ प्रोफेसर ओमशंकर ने सपरिवार कोविड वैक्सीन का एक सिंगल डोज भी नहीं लिया। बल्कि खुलकर उसकी मुखालफत कर रहे थे। उन्होंने 3 साल पहले ही फेसबुक पर कई वीडियो पोस्ट जारी कर कह दिया था कि ये वैक्सीन सेफ नहीं है। जिन्हें कोविड हो चुका है उनके अंदर इम्यूनिटी डेवलप हो चुकी है, जो कि बाहर से दी गई वैक्सीन से ज्यादा कारगर है। प्रो. ओमशंकर ने बताया, क्यों कोविड की वैक्सीन सेफ नहीं प्रो. ओमशंकर ने बताया इसका ह्यूमन बॉडी पर किस तरह से बुरा असर पड़ रहा है और इस स्थिति से निबटने के लिए तमाम नुस्खों की बाढ़ आ गई है, क्या ये सही इलाज है। यदि नहीं तो फिर कैसे इस संकट को टालें, क्योंकि भारत के 67.18% लोगों ने वैक्सीन की कंप्लीट डोज लगवा रखी है और अब उनमें से भी कुछ लोग रिस्क पर हैं। काफी लोगों ने तीसरी डोज ले रखी है l उनको और ज्यादा खतरा है। पहले जानते हैं, क्या है अनसेफ वैक्सीन का मामला… कोविड वैक्सीन बनाने वाली कंपनी एस्ट्रेजेनिका ने ब्रिटेन की कोर्ट में स्वीकारा है कि उनकी बनाई वैक्सीन लेने से कार्डियक अरेस्ट का साइड इफेक्ट हो सकता है। ये रेयर केस में देखा जा रहा है। ब्रिटेन के जेमी स्कॉट ने पिछले साल एस्ट्राजेनेका के खिलाफ ब्रिटेन के कोर्ट में केस किया था। क्योंकि, वैक्सीन लेने के बाद उनके खून में थक्का जमने लगा था। ब्रेन से खून का संचार नहीं हो पा रहा था। इससे उन्हें थ्रोम्बोसाइटोपेनिया सिंड्रोम (TTS) हो गया। जेमी स्कॉट के परिजन कोर्ट में पहुंचे और कंपनी के खिलाफ याचिका दायर कर आरोप लगाया कि कंपनी की वैक्सीन लेने के बाद से ही उनको दिक्कतें होने लगी थी। ब्रिटेन की कोर्ट में ऐसे 51 केस दायर हो गए, जिसमें वैक्सीन की वजह से उनको हेल्थ संबंधी दिक्कतें हुईं। पहले तो कंपनी में ऐसे किसी जानकारी से इनकार किया, लेकिन फरवरी महीने की 29 तारीख को कोर्ट में स्वीकार कर लिया कि रेयर कंडीशन में इससे कार्डियक अरेस्ट का रिस्क है। एस्ट्राजेनेका फार्मा कंपनी की बनाई वैक्सीन को भारत के सीरम इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया में कोविशील्ड नाम से तैयार किया गया। अब भारत में भी इस मामले को लेकर बवाल काफी तेज हो गया है। वहीं लोकसभा चुनाव ने आग में घी झोंकने का काम किया है। अब पढ़ते हैं सवाल-जवाब… सवाल – वैक्सीन और हार्ट अटैक के बीच क्या कनेक्शन है? जवाब – अभी इस पर रिसर्च होना बाकी है कि वैक्सीन कैसे डायरेक्ट कार्डियक अरेस्ट को बढ़ावा दे रही है। लेकिन, कई शुरुआती रिसर्च में ये बात सामने आई है कि वैक्सीन की वजह से दिल की नसों में कहीं कहीं स्वेलिंग हो जा रही है। स्वेलिंग के इसी हिस्से में ब्लड क्लॉटिंग भी हो रही है। सवाल – हार्ट अटैक के लक्षण पहले से मालूम चल जाते हैं। लेकिन, आज कल कई केस में ऐसा क्यों नहीं देखने को मिल रहा है? जवाब – अब जो हार्ट अटैक आ रहे उसमें लक्षण नहीं दिख रहे। क्योंकि, वैक्सीन ले चुके लोगों के दिल में कब क्लॉटिंग शुरू हो जाए और ब्लड फ्लो रुक जाए, कुछ भी कहा नहीं जा सकता। अभी मेडिकल साइंस को सीरियसली इस संकट को खत्म करने के लिए एकजुट होना होगा। सवाल – वैक्सीन लेने के बाद ही कार्डियक अरेस्ट से अचानक मौतें हो रहीं, ये कैसे कह सकते हैं ? जवाब – कोविड के बाद कार्डियक अरेस्ट के नेचर में चेंज आया है। ज्यादा मेहनत का काम करने पर हार्ट फेल हो जा रहा। कई रिसर्च भी आए हैं कि वैक्सीन के बाद से ही हार्ट अटैक के केसेज तेजी से बढ़े हैं। वहीं, वैक्सीन की प्रॉपर टेस्टिंग भी नहीं हुई है। वैक्सीन से पहले ऐसे किसी केस के बारे में बता दें। कंपनी के मुताबिक, वैक्सीन लेने के बाद काफी लोगों दिक्कतें आईं हैं। सवाल – सोशल मीडिया पर इलाज के कई नुस्खे वायरल हैं कि खून को पतला कर लेने पर ये रिस्क नहीं होगा ? जवाब- ये बिल्कुल भ्रामक नुस्खे हैं। हम खून को पतला करने की दवा खाने लगे और हमारा खून पहले से ही पतला हो, तब तो और गंभीर दिक्कत होगी। कट जाने या चोट लगने पर ब्लड बहना ही नहीं रुकेगा। क्योंकि थक्का ही नहीं बन पाएगा। खून की प्रॉपर जांच कराने के बाद ही, पता चल सकेगा कि खून पतला है या मोटा। वहीं, खून का मोटा होना ही एकमात्र वजह कार्डियक अरेस्ट का नहीं है। दिल की नसों में सूजन और दूसरी बीमारियां भी हो सकती हैं। इसलिए, पूरे देश के वैज्ञानिकों और डॉक्टरों की कमेटी बनाकर इस रिस्क से पार पाने की कवायद की जानी चाहिए। सवाल – आपने और आपके परिवार ने वैक्सीन नहीं लगवाई, कैसे पहले ही खतरा भांप लिया ? जवाब – मेडिकल साइंस का एक रूल है कि यदि कोई वैक्सीन आम लोगों के लिए आ रही है तो 10 से 15 साल तक उसे प्री क्लीनिकल और फिर 4 फेज के क्लीनिकल टेस्ट से गुजरना होगा। पहले जानवरों पर और फिर वालंटियर्स पर इसको टेस्ट करना होता है। ऐसे में उसके साइड इफेक्ट की जानकारी होते ही वैक्सीन में सुधार किया जाता है। ऐसे में लॉन्ग टाइम की एक फायदेमंद वैक्सीन सामने आती है। कोविशील्ड या कोवैक्सिन के मामले में ऐसा नहीं हुआ। कोविड की लहर चलने के साथ ही, वैक्सीन लगा दी गई। महामारी फैलने के 1 से 2 साल के अंदर वैक्सीन बनाना संभव ही नहीं है। इसलिए न तो मैने और न ही परिवार के किसी सदस्य को वैक्सीन लगवाने दिया। मैंने पूरी डॉक्टरी नॉलेज ली है, उसी के आधार कर ऐसा बचाव कर रहा था। सवाल – आपने जब वैक्सीन के खिलाफ मुहिम चलाई, तो डॉक्टरों या सिविल सोसायटी की मदद मिली थी ? जवाब – वैक्सीन जल्दबाजी में आई थी, लिहाजा मैंने खुलकर प्रतिरोध शुरू क्या। सोशल मीडिया और OPD में आने वाले मरीजों को सलाह दी कि वैक्सीन न लगवाएं। खुद में सुरक्षित रहें और इम्यूनिटी बेहतर रखें। अफसोस की बात है कि खुद BHU के डॉक्टर्स ही मेरे खिलाफ बोलने लगे। कोई पागलखाने में भर्ती करने की सलाह दे रहा था, तो कोई विपक्ष का नेता घोषित कर दिया। वैक्सीनेशन काल में देशद्रोही तक बना दिया गया। सवाल – आम लोगों के मन में इतना डर बैठ गया था कि वैक्सीन लगवाना अनिवार्य बन गया था। तो इसमें आम लोगों की क्या गलती थी ? जवाब – मैं आम लोगों को दोष नहीं देता, लेकिन डॉक्टर्स तो मेडिकल साइंस के हर एक कंडीशन से वाकिफ हैं। उन्हें, तो कम से कम आम लोगों की जान बचाने के लिए मुखर होना था। इतनी तेजी से वैक्सीन का आ जाना, ऐसा लग रहा है कि जैसे वैक्सीन के लिए हो कोविड महामारी लाई गई थी। फिर तो ये तो एक तरह से कंपनियों के द्वारा किया गया एक संगठित क्राइम है। सवाल – वैक्सीन से कोविड पर कंट्रोल भी तो लगा है, नहीं होता तो काफी लोग मारे जा सकते थे, क्या आप मानते हैं ? जवाब – नहीं, ये एक मिथ्या है। वैक्सीन से कोविड न होने का कोई ऐसा रिसर्च सामने नहीं आया है। 60 से 70% केसेज में नेचुरल इम्यूनिटी यानी कि संक्रमित होकर रिकवर हुए लोगों को कोविड के दूसरे वेरिएंट से निजात मिली थी। दरअसल, कोविड की दूसरी वेव में डेल्टा वैरिएंट ने हर किसी व्यक्ति को अपनी चपेट में ले लिया था। हालांकि, बहुतों में लक्षण नहीं दिखे थे। जिन जिन को ये डेल्टा वैरिएंट अपनी चपेट में लिया था, वो सब अब कोविड से लड़ने में सक्षम हैं। इजराइल ने भी अपने रिसर्च में ये साबित किया कि नेचुरल इम्यूनिटी वैक्सीन के मुकाबले 6 से 24 गुना ज्यादा कारगर है। सवाल – कार्डियक अरेस्ट से होने वाली अचानक मौतों पर कंट्रोल कैसे होगा ? जवाब – ICMR ने अभी तक ऐसे किसी रिसर्च का ऐलान नहीं किया है। होना ये चाहिए कि जितने भी लोगों की अचानक से मौत हो रही है, उन सभी का थोरो पोस्टमॉर्टम होना चाहिए। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट की स्टडी कर मौत की वजहों का साइंटिफिक एविडेंस देखना होगा। वजह की जानकारी होते ही इलाज में काफी मदद मिलेगी। सरकार की ओर से स्थानीय स्तर पर नीतियां बनेंगी। सवाल – कार्डियक अरेस्ट से अचानक होने वाली मौतों पर रिसर्च के लिए क्या स्टेप उठाए जाने चाहिए ? जवाब – हर एक राज्य और जिले में छोटे छोटे रिसर्च सेंटर होने चाहिए। जहां भी कार्डियक अरेस्ट से ऐसी अचानक मौत हो रही है, उनका थोरो पोस्टमॉर्टम कराकर उनके अंगों को प्रिजर्व किया जाना चाहिए। जिससे उनकी हिस्टोरोजिकल एग्जामिनेशन स्टडी के बाद पता किया जा सके कि खास अंग में क्या गड़बड़ी हुई थी। यदि ब्लड क्लाॅट हो रहा है तो प्रॉपर ब्लड टेस्ट करके एक मार्कर तैयार किया जा सकता है। इसी से मर्ज पकड़ में आएगा। इसमें ये पता चलेगा कि एक ही वजह से हार्ट अटैक की समस्या हो रही है या उसके अलग अलग कारण हैं। ब्लड क्लॉटिंग, नसों में सूजन, श्वांंस में डिफरेंस या हार्ट बीट का अनियंत्रित हो रहा है, इन सबकी जानकारी मिल जाएगी।

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