2024 के चुनाव के बारे में दो चीजें बहुत अलग हैं, और यहां हम उसकी लंबाई की बात नहीं कर रहे हैं। पहली है, दक्षिण पर अत्यधिक ध्यान केंद्रित होना। और दूसरी है कि वैश्विक भू-राजनीति- जिसका पाकिस्तान से सरोकार नहीं है- का मतदाताओं के मूड पर असर डालना। चलिए, मैं आपको समझाती हूं। मैं इस समय एक सड़क यात्रा पर हूं, जो तमिलनाडु में कन्याकुमारी से शुरू हुई है। हम कश्मीर जा रहे हैं। रास्ते में हम नेताओं और लोगों से बात करने के लिए रुक रहे हैं। हमारी सीरीज का नाम है- डेमोक्रेसी के ढाबे। मैंने दक्षिण से अपनी यात्रा केवल इसलिए शुरू नहीं की, क्योंकि तमिलनाडु में पहले चरण का मतदान हो रहा था। तमिलनाडु पर प्रधानमंत्री का लगातार फोकस करना, भाजपा तमिलनाडु इकाई के प्रमुख अन्नामलै की राष्ट्रीय स्तर पर पहचान का बनना और इस बात पर एक बड़ी बहस देश में निर्मित होना कि क्या उत्तर और दक्षिण में राजनीतिक प्रतिक्रियाएं एक-दूसरे से अलग होती हैं- ये कुछ फैक्टर हैं जो मेरे जैसे पत्रकारों को दक्षिण में लेकर आए हैं। चुनावों के समय जहां कभी यूपी मीडिया की सुर्खियों में रहता था, अब वही गौरव तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक जैसे राज्यों को मिलने लगा है। यह कॉलम लिखे जाने तक मैं कन्याकुमारी से तिरुवनंतपुरम, उसके बाद कोयंबटूर और वायनाड और फिर मैसूर और बेंगलुरु तक यात्रा कर चुकी हूं। कर्नाटक को छोड़कर तमिलनाडु या केरल जैसे राज्यों में भाजपा को इक्का-दुक्का सीटों से ज्यादा जीतने में अभी समय लग सकता है। लोकप्रिय पुलिसकर्मी से नेता बने अन्नामलै जानते हैं कि तमिलनाडु में भाजपा को दीर्घकालीन योजनाएं बनानी होंगी। उनकी नजर सीटों के बजाय वोट शेयर पर है। उन्होंने 20% वोट शेयर के लक्ष्य को हासिल करने पर ध्यान केंद्रित किया। यदि वे ऐसा कर पाते हैं तो यह द्रविड़ राजनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव की शुरुआत होगी। लेकिन दक्षिणी राज्यों में अपनी यात्रा के दौरान मैंने पाया कि यहां जो लोग प्रधानमंत्री के प्रशंसक हैं, वे राम मंदिर या हिंदुत्व के बारे में बात नहीं करते हैं। इसके बजाय भाजपा को वोट देने का सबसे आम कारण वो ये बताते हैं कि दुनिया में भारत का कद बढ़ गया है। यह 2024 के चुनावों के लिए भाजपा का सबसे सफल राजनीतिक संदेश रहा है। लेकिन अधिकांश भारतीय वास्तविक बारीकियों पर चिंतित नहीं हैं या शायद उनसे अनजान भी हैं। उदाहरण के लिए, कोई भी यह नहीं बताता कि शायद पश्चिमी देश भारत को चीन के सामने शक्ति-संतुलन करने वाली ताकत के रूप में देखते हों। या भारत के प्रति अचानक इतना मधुर रवैया अपनाने का संबंध भारत की बड़ी अर्थव्यवस्था या बाजार से हो सकता है। ऐसा नहीं है कि भाजपा के वोटरों को कोई शिकायत नहीं है। जैसा कि हाल ही में सीएसडीएस सर्वेक्षण में पाया गया कि बेरोजगारी और महंगाई उनकी चिंताओं में सबसे ऊपर हैं। शहरी मतदाताओं में टैक्स की ऊंची दरों और बुनियादी ढांचे को लेकर शिकायतें थीं। लेकिन इस पर सभी एकमत थे कि मोदी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि वैश्विक मंच पर भारत की बढ़ी ताकत है। यह मेरे पत्रकारिता जीवन के 30 वर्षों में पहला ऐसा चुनाव होगा, जहां विदेश नीति के किसी पहलू की जमीनी स्तर पर इतनी चर्चा है। जबकि पहले इस तरह की चर्चाएं केवल पाकिस्तान के संदर्भ में होती थीं। मोदी की जिन अन्य विशेषताओं को सराहना मिली, उनमें से एक यह धारणा थी कि वे बहुत परिश्रम करते हैं। जैसा कि एक मतदाता ने कहा, वे एकचित्त होकर काम पर ध्यान केंद्रित करते हैं। अपने मतदाताओं और प्रशंसकों से मिलने वाले ऐसे फीडबैक के बाद आश्चर्य होता है कि प्रधानमंत्री को अचानक हिंदू-मुस्लिम नैरेटिव पर फोकस करने की जरूरत क्यों महसूस हुई? राजस्थान में उनके द्वारा दिए भाषण को कांग्रेस ने हेट-स्पीच की संज्ञा दी थी, लेकिन प्रधानमंत्री रुके नहीं और उन बातों को फिर से दोहराया। क्या ऐसा इसलिए है क्योंकि- जैसा कि विपक्ष का मानना है- पहले चरण की वोटिंग उतनी अच्छी नहीं रही थी जितनी भाजपा को उम्मीद थी? या इसलिए क्योंकि प्रधानमंत्री को एक साथ कई प्रकार के मतदाताओं को अपने से जोड़ने की कला में महारत हासिल है। क्योंकि बेंगलुरु में मुझसे मिले एक मोदी प्रशंसक ने कहा था कि भाजपा को वोट देते समय वे चाहते हैं कि पार्टी धार्मिक विभाजन पैदा करने वाले मुद्दों को उठाना बंद कर दे। यकीनन ये आवाजें दक्षिण की हैं और वहां पर राजनीति उत्तर भारत से भिन्न होती है। लेकिन इन बातों ने इसमें मेरा विश्वास पुख्ता किया कि लोग अनेक कारणों से मोदी को वोट देते हैं। कुछ उनकी आक्रामक हिंदुत्व की राजनीति से प्रभावित होते हैं, कुछ लोक कल्याणकारी योजनाओं से और कुछ कोई और विकल्प न होने पर उन्हें वोट देते हैं। लेकिन जब वोटर राम मंदिर से ज्यादा दुनिया में भारत की छवि को महत्व दे रहे हों तो इससे ये सवाल जरूर उठ खड़ा होता है कि आगे मोदी को कैसा रवैया अख्तियार करना चाहिए। (ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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