ईवीएम जब नहीं थी, इसके पहले चुनाव प्रक्रिया कई दौर से गुजरी। पहले अलग अलग उम्मीदवारों के लिए अलग- अलग मतपेटियाँ हुआ करती थीं। बाद में सभी उम्मीदवारों के चुनाव चिन्ह के साथ एक ही पर्चा बनाया गया। पर्चा जब तक़ रहा, निरक्षरता के दानव ने कई विसंगतियाँ पैदा कीं। पिछली सदी में लगभग पचास सालों में सरकारों द्वारा अधिकांश लोगों को शिक्षित बनाने के प्रयास इसलिए नाकारा साबित हो गए क्योंकि हमारी सामाजिक व्यवस्था, आर्थिक नीति और जीवन शैली अमीरों को और अधिक अमीर और ग़रीबों को और अधिक गरीब बनाती चली गई। ग़रीबों के लिए मुफ़्त शिक्षा की नीति के बावजूद शिक्षा पर हमारी सरकारों का कामचलाऊ रवैया नुक़सानदेह साबित हुआ। स्कूल तो खूब खोले गए लेकिन शिक्षा के स्तर में कोई सुधार नहीं किया। ग़रीबों के लिए शिक्षा मुफ्त तो कर दी लेकिन ज़्यादातर ग़रीबों तक यह संदेश पहुँचा ही नहीं पाए। बाक़ी सुविधाओं के तो बुरे हाल रहे। अमीरों ने खुद को काग़ज़ों पर गरीब बताकर सारी सुविधाएँ चट कर लीं। साक्षरता अभियान भी एक तरह से ख़ानापूर्ति ही साबित हुआ। निरक्षरता के कारण चुनावों में अवैध मतों की संख्या कई सीटों पर जीत के अंतर से भी ज़्यादा रही। किसी ने एक की बजाय चार उम्मीदवारों को वोट दे दिया। किसी ने मतपत्र पर अंगूठा लगा दिया। कई पढ़ें-लिखों ने भी कसर नहीं छोड़ी। भाई लोगों ने मतपत्रों पर नारे लिख दिए। कुछ उदाहरण
देखिए- 1989 के लोकसभा चुनाव में राजस्थान की सलूम्बर सीट से भाजपा के नंदलाल मीणा ने कांग्रेस के भेरूलाल मीणा को मात्र 878 वोटों से हराया जबकि निरस्त मतों की संख्या 18,837 थी। 1980 में झालावाड़ संसदीय सीट पर जीत का अंतर 5,605 था जबकि निरस्त मत 8,619 थे। विडम्बना ही है कि 1998 में भी मध्यप्रदेश की पांच संसदीय सीटों पर जीत के अंतर से अवैध मतों की संख्या ज्यादा थी। हैरत की बात यह है कि ये पांचों सीटें SC-ST के लिए सुरक्षित थीं। छत्तीसगढ़ तब था नहीं। रायगढ़ सुरक्षित सीट के प्रतिष्ठित चुनाव में कांग्रेस के अजीत जोगी ने भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष नंद कुमार साय को 382 मतों से हराया, जबकि निरस्त मतों की संख्या 19,475 थी। यही हाल बस्तर, सरगुजा, मंडला और सारंगगढ सुरक्षित सीटों पर भी रहा था। अगर इसे शिक्षा से जोड़ा जाए तो नतीजा निकाला जा सकता है कि लाख प्रयासों के बावजूद सरकारें सबके लिए शिक्षा उपलब्ध नहीं करा पाईं। केवल ग़रीबों के लिए बजट अलाटमेंट कर देने से ही सरकारें अपने कर्तव्य की इतिश्री समझती रहीं।

By

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Subscribe for notification