‘पंजाब की रोपड़ जेल से मुख्तार अंसारी को जिस एंबुलेंस से मोहाली कोर्ट में पेशी पर ले जाया जा रहा था वह बाराबंकी में रजिस्टर्ड थी। एंबुलेंस को बहुत ही लग्जरी तरीके से तैयार किया गया था। हमने जब उसकी जांच की तो वह एंबुलेंस फर्जी डॉक्यूमेंट से रजिस्टर्ड पाई गई। उस लग्जरी एंबुलेंस को मुख्तार अपने रसूख और पंजाब के अफसरों की मिलीभगत से निजी वाहन के रूप में इस्तेमाल कर रहा था। एंबुलेंस का रजिस्ट्रेशन कराने की साजिश में माफिया की करीबी डॉ अल्का राय शामिल थी। इस मामले में सीधे मुख्तार के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ। मुख्तार को पंजाब से UP की जेल में वापस लाने की सबसे बड़ी वजह यही मुकदमा भी बना।’ यह कहना है IPS यमुना प्रसाद का। IPS यमुना ने सिस्टम की तमाम चुनौतियों से लड़ते हुए माफिया मुख्तार के खिलाफ कई एक्शन लिए। यमुना प्रसाद ने संभल में दो सिपाहियों की हत्या का बदला डबल एनकाउंटर से लिया। खाकी वर्दी में आज कहानी IPS यमुना प्रसाद की। ये वही IPS हैं जो दीवाली में एक बुजुर्ग महिला के सारे दिए खरीद लेते हैं और मां से बिछड़े बच्चे को मिलाने के लिए उसे गोद में लेकर घर तक पहुंचते हैं। हिंदी मीडियम से पढ़ाई कर IPS बने यमुना प्रसाद की कहानी आप 5 चैप्टर में पढ़ेंगे…। उत्तर प्रदेश के छोटे से जिले सिद्धार्थनगर में यमुना प्रसाद का जन्म 1977 में हुआ। वह बताते हैं, मेरे पिता घनश्याम प्रसाद जिले में ही ठेकेदारी करते थे। हमारा घर बढ़नी कस्बे में था और मेरी शुरुआती पढ़ाई लिखाई वहीं कस्बे में ही शुरू हुई। मैं पहली बार अमर बाल विद्या मंदिर में पढ़ने के लिए गया था और वहां पर 8वीं तक की पढ़ाई कंपलीट की। मेरा कस्बा उन दिनों ठीक ठाक था। इंटर तक की पढ़ाई वहीं हो जाती थी। आठवीं पास करने के बाद मैंने बृजेश्वरी इंटर कॉलेज में दाखिला ले लिया। 1990 में 10th और 1992 में 12वीं कंपलीट की। अब पढ़ाई के लिए शहर जाने की तैयारी हुई तो पिता ने लखनऊ शहर का चयन किया। मैंने यहां क्रिश्चियन कॉलेज में एडमिशन लिया। हिंदी मीडियम में पढ़ाई की थी तो आर्ट साइड में ही दाखिला लिया। 1996 में मैंने ग्रेजुएशन कंपलीट कर लिया। हिस्ट्री मेरा पसंदीदा विषय था। इसी से मैंने PG भी कंपलीट किया। मेरा शुरू से ही खाकी वर्दी पहनने का शौक था। इसलिए पीजी के साथ ही मैंने सिविल सर्विस की तैयारी शुरू कर दी। साथ ही मैंने नेट भी क्वालीफाई किया। तैयारी के दौरान ही 2001 में मेरा चयन स्टेट पीसीएस में हो गया। लेकिन उन दिनों चयन में कुछ तकनीकी दिक्कत थी तो ज्वॉइनिंग तुरंत नहीं हो रही थी। इस दौरान मैंने अपनी तैयारी जारी रखी। हिंदी और हिस्ट्री से मैं सिविल सर्विस की तैयारी करता रहा। कुछ दिनों के लिए दिल्ली में कोचिंग भी जॉइन की। इसके बाद 2004 में मैंने कॉपरेटिव एंड पंचायत डिपार्टमेंट में नौकरी जॉइन कर ली। आराम से नौकरी करने लगा, लाइफ काफी कंफर्टेबल चलने लगी और सिविल सर्विस की तैयारी भी कैजुअल हो गई। 5 साल नौकरी करने के बाद एक बार फिर दिमाग में आया कि इस तरह तो क्लरिकल टाइप नौकरी करते हुए जीवन समाप्त हो जाएगा। न तो कुछ अलग कर पाऊंगा और न किसी के लिए कुछ खास। इसी सोच के साथ फिर से किताबों को पलटना शुरू किया। 2009 के सिविल सर्विस में पेपर देने के लिए फिर अप्लाई कर दिया। पहली बार सफलता नहीं मिली। 2010 में फिर फॉर्म भरा। इस बार जब ऑफिस में वैरिफिकेशन की डिटेल मांगी गई तो मेरे बॉस थे डिप्टी डॉयरेक्टर राजीव रतन मालवीय। जब यह जानकारी उन्हें मिली तो उन्होंने मुझे अपने पास बुलाकर पूछा, तुम सिविल सर्विस अटेंम्ट कर रहे हो। इस पर मैंने हां में सिर हिला दिया और उसके बाद से उन्होंने बहुत सपोर्ट किया। डिपार्टमेंट से एक मेंटल सपोर्ट मिला तो तैयारी और बेहतर होने लगी। तीसरे अटेंम्पट में मैंने सिविल सर्विस क्रैक कर दिया। 2012 में उत्तर प्रदेश कैडर में तैनाती मिली और यहीं से शुरू हो गया खाकी वर्दी के साथ सफर। अपनी पहली ज्वाइनिंग पर चर्चा करते हुए यमुना प्रसाद बताते हैं, यह बहुत ही रोमांचक था, जब मैं पहली बार वाराणसी में इंडिपेंडेंट ASP बना तो लोकसभा चुनाव की घोषणा हो चुकी थी। वाराणसी से नरेंद्र मोदी चुनाव लड़ने आ रहे थे। इसलिए वाराणसी शहर पर पूरे देश की नजर बनी हुई थी। ऐसी स्थिति में मुझे पुलिस महकमे की ओर से वाराणसी का चुनावी प्रबंधन संभालने की जिम्मेदारी दी गई। यहां सुरक्षा के इंतजाम करना, फोर्स को डिप्लॉय करना। अलग-अलग थानों का रिव्यू, जिस रूट पर रैली, रोड शो और जनसभा होती थी वहां के सुरक्षा व्यवस्था के इंतजाम देखना। तमाम आला अधिकारी पहले सुरक्षा का रूट चार्ट देखते थे। उसके बाद एग्जीक्यूशन का ऑर्डर करते थे। मेरे लिए वाराणसी अब तक की सबसे लर्निंग सिटी रही। एक बार तो एक ही रोड पर अरविंद केजरीवाल और मोदी के रोड शो की इजाजत हो गई थी। ऐसे में बहुत ही तनावपूर्ण स्थिति बनी हुई थी। मैंने अपने सीनियर्स से बात करके पर्याप्त मात्रा में फोर्स तो डिप्लॉय करवा लिया लेकिन फिर भी डर था कि कहीं कोई विवाद न खड़ा हो जाए। जब ये रोड शो शुरू हुआ तो दो से तीन घंटे तक बहुत अलर्ट मोड पर रहना पड़ा। जैसे ही दोनों के रोड शो आमने-सामने होने वाले थे तो केजरीवाल का रोड शो दूसरे रोड पर मुड़वा दिया गया। उस समय नेताओं ने भी सपोर्ट किया और उन्होंने अपना रूट दूसरे रास्ते से कंपलीट कर लिया। यह मसला बहुत ही सावधानीपूर्वक निपट गया। एक बड़ी सीख मिली कि किसी भी बड़े इवेंट को किस तरह से हैंडल करना है और उसके लिए पहले से कितनी तैयारी करनी पड़ती है। यहां की लर्निंग मेरे लिए कई शहरों में काम आई। वाराणसी, आयोध्या और कुशीनगर के बाद यमुना प्रसाद को पहली बार एसपीआरए के पद पर तैनाती बरेली में मिली। बरेली की तैनाती को याद करते हुए यमुना बताते हैं कि मैंने अब तक के अपने कॅरियर का सबसे ब्रूटल मर्डर यहीं पर देखा। मैं उन दिनों एसपी आरए के पद पर तैनात था। तब वहां एक व्यापारी नेता, उनकी पत्नी, बेटी और बेटे की बड़ी जघन्यता से हत्या की गई थी। इस घटना का खुलासा तब हुआ जब बच्चों को स्कूल ले जाने के लिए वैन वाला घर पहुंचा था। इस जघन्य वारदात से पूरे इलाके में सनसनी फैल गई। जब पुलिस मौके पर पहुंची तो पूरे परिवार की लाशें अलग-अलग कमरों में पड़ी थीं खून से लथपथ। ऐसा लग रहा था जैसे पहले सभी को लाठी-डंडों से बुरी तरह पीटा गया। उसके बाद उनके गले काटे गए। बच्चों के शरीर पर बुरी तरह चोट के निशान थे। उनकी डेडबॉडी देखकर ऐसा लगा जैसे जघन्यता की सारी हदें पार हो गई हों। पोस्टमॉर्टम और अंतिम संस्कार के बाद जब हमने इन्वेस्टिगेशन शुरू की तो इसमें छैमार गैंग का हाथ सामने आया। पश्चिम यूपी में छैमार गैंग बावरिया और कच्छा बनियान गिरोह की तरह ही काम कर रहा था। हमने एक महीने तक इनकी रेकी की। ये लोग मोहल्लों में सामान बेचने, घर में कबाड़ खरीदने और लोहा-लंगड़ का काम करने लिए घुसते थे। धीरे-धीरे ये घरों की रेकी करते थे और जो मजबूत घर मिलता तो उसी में लूटपाट को अंजाम देते थे। जांच पड़ताल कि प्रक्रिया में हमने इनके एक सदस्य को पकड़ लिया। इसके सहारे गैंग के और मेंबर भी पकड़े गए। उससे पूछताछ में बहुत ही चौंकाने वाला खुलासा हुआ। दरअसल, इनका एक नियम है जो ज्यादा जितनी जघन्यता से मर्डर करेगा, वही आगे उनका मुखिया बनेगा। इसीलिए ये लोग लूटपाट के दौरान बहुत ब्रूटल मर्डर करते थे। ये लोग सामान और गहने आदि लूटकर अपने पास नहीं रखते थे। गांवों में इनका एक मुखिया होता था। ये सारा सामान उसी के पास पहुंचा देते थे। उनसे साल भर तक लूट करने वालों के घर वालों को राशन पानी मिलता रहता था। हमने इनके पूरे गैंग का खुलासा किया और सबको जेल भेजा गया। अपने सबसे चैलेंजिंग टास्क पर चर्चा करते हुए यमुना कहते हैं कि जब मैं वर्ष 2019 में पहली बार इंडिपेंडेंट एसपी संभल बना तो वहां एक बड़ा मामला सामने आया। यहां पुलिस और कैदियों से भरी वैन पर हमला कर कुछ बदमाश अपने तीन साथियों को छुड़ा ले गए। हमले के दौरान दो सिपाहियों की हत्या कर दी गई। ये पूरे पुलिस महकमे के लिए बहुत ही चुनौती पूर्ण था। दरअसल, हुआ कुछ यूं था कि मुरादाबाद से जेल वैन में 24 कैदियों को पेशी पर चंदौसी लाया गया था। दिन भर की पेशी के बाद शाम को जब कैदियों की वैन को मुरादाबाद वापस ले जाया जा रहा था, तब पांच बजे के आस-पास बनियाठेर इलाके में पहले से घात लगाए बैठे बदमाशों ने वैन पर हमला कर दिया। ये सभी बदमाश आधुनिक असलहों से लैस थे। बदमाश इस कदर गोली चला रहे थे कि ड्राइवर के साइड में बैठे सिपाहियों और कैदियों की उनकी तरफ झांकने की भी हिम्मत नहीं हुई। कैदियों के साथ बैठे दो सिपाहियों को गोली मार दी और एक की राइफल भी लूट ली। ये बदमाश तीन कैदियों को छुड़ाकर ले गए। जिन सिपाहियों को गोली मारी गई थी, उन्हें सीधे अस्पताल ले जाया गया। जहां उनकी मौत हो गई। इतनी बड़ी वारदात ने पूरे जिले की पुलिस को हिला दिया। जब हम लोगों ने कैदियों की गिनती करवाई तो पता चला कि तीन कैदियों को वे लोग छुड़ा ले गए हैं। इनमें कमल, शकील और धर्मपाल शामिल थे। ये तीनों ही पश्चिम यूपी के दुर्दांत अपराधी थे। इन पर कई हत्या, रेप, लूट, अपहरण और फिरौती के मामले दर्ज थे। दो सिपाहियों की हत्या ने मुझे बेचैन कर दिया। अब हम लोग इनके पीछे लग गए। सरकार की ओर से इन तीनों बदमाशों पर ढाई-ढाई लाख रुपए का इनाम घोषित किया गया। लोकल पुलिस की दस और एसटीएफ की टीमें इन बदमाशों के पीछे लग गई। हम लोग संभल के साथ पड़ोसी जिले अमरोहा और बदायूं में भी सर्च ऑपरेशन चला रहे थे। इसी बीच इन बदमाशों के अमरोहा में होने की सूचना मिली। अमरोहा पुलिस अपनी टीम के साथ इनके पीछे लग गई। आदमपुर के पास पुलिस चेकिंग कर रही थी, इस बीच बाइक से दो बदमाश आते दिखाई दिए। बदमाशों ने जब पुलिस की चेकिंग देखी तो फायरिंग करते हुए भागने लगे। जवाबी फायरिंग में एक बदमाश मारा गया। दूसरा भागने में सफल रहा। जो बदमाश मारा गया, उसकी पहचान कमल के रूप में हुई। इसके 40 दिन के अंदर दूसरे बदमाश को मार गिराया गया और तीसरे को गिरफ्तार कर लिया गया। जब तीनों बदमाशों पर एक्शन हो गया तब मन को शांति मिली। अपने सबसे डेयरिंग टास्क पर बात करते हुए IPS बताते हैं कि वर्ष 2021 में अचानक एक एंबुलेंस सुर्खियों में आने लगी। सोशल मीडिया पर तमाम वीडियो वायरल होने लगे। इस एंबुलेंस से पूर्वांचल का माफिया मुख्तार पंजाब की रोपड़ जेल से मोहाली कोर्ट में पेशी पर जा रहा था। इस एंबुलेंस पर UP 41 AT 7171 का नंबर पड़ा था। यानी बाराबंकी में यह एंबुलेंस रजिस्टर्ड बताई जा रही थी। यह एंबुलेंस बहुत ही लग्जरी थी, इसके अंदर बैठने-लेटने से लेकर अन्य तरह की सुविधाएं थीं। पंजाब में जेल अफसरों की मिलीभगत से मुख्तार इसका इस्तेमाल एक निजी कार के रूप में कर रहा था। वो जेल के बाहर इसी एंबुलेंस से जाता था। जैसे ही इसका नाम बाराबंकी से जुड़ा तो मैंने इस पर सर्चिंग शुरू करवाई। इस नंबर पर जो नाम, पहचान पत्र, पैन कार्ड और अन्य दस्तावेज लगाए गए थे, सब फर्जी पाए गए। यह डाक्यूमेंट जिस पते पर दर्ज थे वह पता निकला ही नहीं। एंबुलेंस की फिटनेस खत्म हुए तीन साल हो चुके थे। इसके बाद भी उसका इस्तेमाल हो रहा था। अब बड़ी चुनौती यह पता लगाना था कि इसमें किस अस्पताल का रजिस्ट्रेशन दिखाया गया है या बिना अस्पताल की डिटेल दिए ही एंबुलेंस का रजिस्ट्रेशन हो गया। किसने यह रजिस्ट्रेशन करवाया और कैसे यह एंबुलेंस पंजाब तक पहुंच गई। हमने इसकी कड़ी दर कड़ी जांच शुरू की। जांच में यह निकलकर आया कि यह एंबुलेंस मऊ के श्याम संजीवनी हॉस्पिटल से कनेक्ट थी। यह अस्पताल बीजेपी नेता अल्का राय का था। हमने जब अल्का राय से पूछताछ की तो उन्होंने कहा कि मेरा मऊ में अस्पताल है। बाराबंकी में न तो उनका कोई अस्पताल है और न ही कोई संस्था। हां इतना जरूर है कि साल 2013 में मऊ सदर से विधायक मुख्तार अंसारी के प्रतिनिधि ने अस्पताल के नाम से एंबुलेंस संचालित करने के लिए दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कराए थे। जिसको उनके अस्पताल के निदेशक ने पूरा किया था। उसके बाद वह एंबुलेंस कहां गई इसकी जानकारी नहीं है। फर्जीवाड़े के ये सब तथ्य सामने आने के बाद सबसे पहले अल्का राय पर मुकदमा दर्ज किया गया। इसके बाद इसी मामले में मुख्तार अंसारी के खिलाफ सीधा मुकदमा दर्ज हुआ। मुख्तार पर जब मैं एक्शन ले रहा था तो सिस्टम में घुसे उसके कई लोग कार्रवाई में बाधक बन रहे थे। मैंने मुख्तार से जुड़ी 50 करोड़ से ज्यादा संपत्ति को कुर्क करवाया। मुख्तार ने कहा- मैं बाइरोड नहीं जा सकता, पुलिस का जवाब- मोहाली कैसे गए इसके साथ ही मैंने कोर्ट में मुख्तार को यूपी में पेशी पर लाने के लिए याचिका भी दायर करवाई। यह पहला फर्जीवाड़े का सीधा मामला था, जिसमें मुख्तार को आरोपी बनाया गया था। इससे पहले ज्यादातर मामलों में उसे साजिशकर्ता के रूप में शामिल किया गया था। जब-जब यूपी में मुख्तार की पेशी होती कुछ न कुछ बहाना करके यूपी आने से इंकार करवा देता। उसने कोर्ट में तर्क दिया कि मैं बाइरोड यूपी नहीं जा सकता। मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया। इसके बाद हमने आधार बनाया कि जब मुख्तार एंबुलेंस से पेशी पर मोहाली जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट तक आ सकता है तो यूपी में पेशी पर क्यों नहीं। प्रदेश सरकार ने भी इस मामले में गंभीरता से पैरवी की। कोर्ट ने इसे संज्ञान लिया और उसे लाने की प्रक्रिया शुरू हो गई। छह अप्रैल 2021 को मुख्तार को दोबारा बांदा जेल में बंद किया गया।

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