वाराणसी: मध्यस्थता केंद्र के भीतर जान से मारने की धमकी मिलने से मचा हड़कंप, न्याय व्यवस्था पर मंडराया खतरा
वाराणसी जिला न्यायालय में चल रही एक पारिवारिक (मैट्रिमोनिया) मध्यस्थता कार्यवाही के दौरान सुरक्षा व्यवस्था की पोल खुल गई है। सोमवार को हुई कार्यवाही के दौरान एक प्रतिभागी को गंभीर परिणाम भुगतने और जान से मारने की धमकी मिलने का सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिससे वादियों में भारी भय और निराशा का माहौल है।
पीड़ित प्रतिभागी, अभिषेक सिंह, के अनुसार वह अपने निर्धारित मामले के सिलसिले में मध्यस्थता केंद्र पहुंचे थे। उन्होंने आरोप लगाया कि विरोधी पक्ष के लोग अपने साथ कई संदिग्ध व्यक्तियों को लेकर आए थे, जिन्होंने अदालत परिसर जैसी संवेदनशील जगह पर भी आक्रामक रवैया अपनाया और माहौल बिगाड़ने की कोशिश की।
सिंह का गंभीर आरोप है कि विरोधी पक्ष के साथ आए कुछ तथाकथित लोगों ने उन्हें खुलेआम जान से मारने की धमकी दी। इतना ही नहीं, उन्होंने खुद को वकील बताते हुए कानून और प्रशासन से बेखौफ होकर अंजाम भुगतने की बात कही। इस शर्मनाक और डरावनी घटना ने अभिषेक सिंह की मानसिक स्थिति और व्यक्तिगत सुरक्षा पर एक गहरा संकट खड़ा कर दिया है।
स्थिति तब और अधिक चिंताजनक हो गई जब पीड़ित पक्ष को आगामी 8 सितंबर को फिर से उसी मध्यस्थता केंद्र में पेश होने के लिए विवश किया जा रहा है, जिससे उनकी सुरक्षा को लेकर खतरा और अधिक बढ़ गया है।
संपादकीय चेतावनी / अस्वीकरण:
इन गंभीर आरोपों की अभी तक स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है, और यह दावा नहीं किया जाता है कि दूसरे पक्ष के सभी लोग इस धमकी में शामिल थे। हालांकि, इस तरह की घटनाओं का सामने आना न्याय प्रणाली की सुरक्षा व्यवस्था पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है।घबराए हुए अभिषेक सिंह ने इस गंभीर मामले में स्थानीय पुलिस और उच्चाधिकारियों का दरवाजा खटखटाने का मन बनाया है। उनकी मांग है कि इस आपराधिक कृत्य की निष्पक्ष जांच हो, मौके पर लगे सीसीटीवी फुटेज को सुरक्षित रखा जाए और धमकी देने वालों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए।
मध्यस्थता केंद्रों में सुरक्षा व्यवस्था पर मंडराते काले बादल
मध्यस्थता प्रक्रिया का उद्देश्य दोनों पक्षों के बीच आपसी सहमति से विवादों का शांतिपूर्ण समाधान निकालना होता है, लेकिन जब ऐसे परिसरों में अपराधी प्रवृत्ति के लोग धमकियां देने लगें, तो यह पूरी न्याय प्रक्रिया की विफलता को दर्शाता है। ऐसी नकारात्मक घटनाएं आम जनता का अदालतों और मध्यस्थता पर से विश्वास पूरी तरह से डिगा रही हैं।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मध्यस्थता के दौरान इस प्रकार की गुंडागर्दी और धमकियों का सिलसिला नहीं रोका गया, तो कोई भी निडर पीड़ित व्यक्ति न्याय पाने की उम्मीद छोड़ देगा।
अभिषेक सिंह के लिए फिलहाल अपनी जान की सुरक्षा सबसे बड़ा मुद्दा बन चुका है। वह बिना किसी डर के कार्यवाही में हिस्सा ले सकें, इसके लिए प्रशासनिक सुरक्षा की सख्त दरकार है। देखना यह होगा कि इस डरावनी घटना के बाद प्रशासन क्या ठोस कदम उठाता है।