बच्चे खिलौनों से खेलेंगे ही सही, उनके लिए खिलौने तोड़ना भी एक खेल है। खेलने की उम्र में उन्हें खूब खिलौनों से खेलने दीजिए। हां, एक काम लगातार करते रहिए और वो ये कि उन्हें प्रौढ़ जरूर करते चलें। उनके भीतर ये भावना जगाएं कि ये सब अस्थाई है, एक दिन छूटेगा। इस तरह वे जीवन के प्रति एक धैर्यवान दृष्टिकोण बना सकेंगे। आजकल स्कूलों में छोटी कक्षाओं में भी ‘बुलीइंग’ की समस्या देखने को मिल रही है। किसी के ऊपर गंभीर टिप्पणी करना, लतीफे छोड़ना, शारीरिक हमला, जाति पर टिप्पणी, बोलने का तरीका, पहनावे पर भद्दे कमेंट किए जाएं तो इसे बुलीइंग कहते हैं। संकोची और सीधे-सादे बच्चे इसके शिकार हो रहे हैं। यह एक दिन बड़ी समस्या बनने वाली है। इसलिए कम उम्र में बच्चे जब खिलौने से खेल रहे हों तो उनको एक प्रौढ़ता का एहसास कराएं कि तुम्हारे जीवन में कई ऐसे खिलौने और चुनौतियां आएंगी, उन्हें लेकर बहुत परेशान मत होना। तब शायद वे बुलीइंग की समस्या से बाहर निकल पाएं। यह परिपक्वता उनको कभी किसी के सामने टूटने नहीं देगी।

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