आज के दौर में जब कानून और न्याय की बात होती है, तो हर नागरिक यह उम्मीद करता है कि तराजू का हर पलड़ा निष्पक्ष रहेगा। लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि हमारा वर्तमान न्यायिक ढांचा और प्रशासनिक तंत्र कुछ इस तरह से विकृत हो चुका है, जहाँ न्याय के सिद्धांतों को ताक पर रखकर केवल पूर्वाग्रह के आधार पर फैसले दिए जा रहे हैं। आज स्थिति यह है कि एक तरफ जहाँ झूठे और निराधार आरोपों का बाजार गर्म है, वहीं दूसरी तरफ कुछ शातिर और अहंकारी (नार्सिसिस्ट) महिलाओं द्वारा इस भ्रष्ट तंत्र का बेशर्मी से दुरुपयोग किया जा रहा है। बिना किसी सबूत या ठोस प्रमाण के केवल एक महिला के कह देने मात्र से पुरुषों को अपराधी मान लेना, न केवल पुरुष वर्ग के साथ घोर अन्याय है, बल्कि यह मानवाधिकारों की सबसे बड़ी विडंबना भी है।
बिना सबूत के आरोप: न्याय के मूल सिद्धांतों की हत्या
कानून का एक चिरपरिचित और शाश्वत सिद्धांत रहा है — “सौ अपराधी छूट जाएं, लेकिन एक निर्दोष को सजा नहीं होनी चाहिए” और “जो आरोप लगाता है, सबूत पेश करने की जिम्मेदारी उसी पर होती है।” परंतु आज के इस तथाकथित आधुनिक और संवेदनशील तंत्र में इस मौलिक नियम को उल्टा कर दिया गया है। आज स्थिति यह है कि आरोपी पुरुष को ही यह साबित करना पड़ता है कि वह बेकसूर है, जबकि आरोप लगाने वाली के पास कोई सबूत, कोई डिजिटल रिकॉर्ड या कोई गवाह तक नहीं होता। मात्र मौखिक बयानों और भावनाओं को हथियार बनाकर कानून को ब्लैकमेलिंग का जरिया बना दिया गया है। जब बिना साक्ष्य के किसी व्यक्ति का चरित्र, उसका भविष्य और उसकी मानसिक शांति को तहस-नहस कर दिया जाता है, तो यह केवल कानूनी त्रुटि नहीं, बल्कि एक सुनियोजित क्रूरता है।
नार्सिसिस्ट (अहंकारी) मानसिकता और तंत्र की मिलीभगत
नार्सिसिस्ट (Narcissistic) व्यक्तित्व विकार से ग्रसित व्यक्ति सहानुभूति से परे होते हैं। इन्हें केवल अपने लाभ, नियंत्रण और दूसरों को मानसिक रूप से प्रताड़ित करने में आनंद मिलता है। जब ऐसी प्रवृत्ति की कुछ महिलाएं इस भ्रष्ट कानूनी और सामाजिक तंत्र के संपर्क में आती हैं, तो वे इसे एक ढाल और हथियार दोनों की तरह इस्तेमाल करती हैं। वे समाज की इस पारंपरिक सहानुभूति का भरपूर फायदा उठाती हैं जिसके तहत महिला को हमेशा पीड़ित मान लिया जाता है।
तंत्र की विफलता देखिए कि वह इस मनोवैज्ञानिक चालाकी को भांपने में पूरी तरह असमर्थ रहता है या फिर जानबूझकर अनदेखा कर देता है। पुलिस थानों से लेकर अदालतों तक, एक तरफा कानूनों और सामाजिक दबाव के चलते बिना यह जांचे कि कौन सही है और कौन गलत, पुरुषों को तुरंत अपराधी के कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है। यह उस तंत्र का पतन है जो सच्चाई के बजाय सिर्फ और सिर्फ रुढ़िवादी पूर्वाग्रहों पर काम करता है।
पुरुषों पर मानसिक और शारीरिक क्रूरता: एक अनदेखा सच
इस एकतरफा और भ्रष्ट व्यवस्था के परिणाम बेहद भयावह हैं। जब एक निर्दोष पुरुष को झूठे मुकदमों में फंसाया जाता है, तो उसकी पूरी जिंदगी दांव पर लग जाती है:
- मानसिक प्रताड़ना और आत्महत्या: लगातार अदालती चक्कर, सामाजिक बदनामी और अपनों के बीच अविश्वास के कारण अनगिनत पुरुष गंभीर अवसाद (डिप्रेशन) का शिकार हो रहे हैं। कई युवा और संभ्रांत पुरुष आत्महत्या जैसे चरम कदम उठाने पर मजबूर हो रहे हैं, लेकिन इस पर कोई राष्ट्रीय बहस या संवेदनशीलता नहीं दिखाई जाती।
- आर्थिक शोषण: झूठी शिकायतों और भरण-पोषण या मुआवजे के नाम पर कानूनी तंत्र का इस्तेमाल करके पुरुषों को आर्थिक रूप से पूरी तरह कंगाल कर दिया जाता है।
- परिवार का टूटना: झूठे आरोपों की आंधी में केवल वह पुरुष ही नहीं, बल्कि उसके माता-पिता, बहनें और पूरा परिवार इस मानसिक यातना की चक्की में पिस जाता है। वृद्ध माता-पिता के बुढ़ापे का सहारा छीन लिया जाता है।
समानता और निष्पक्षता की पुकार
समानता का अर्थ यह कतई नहीं है कि एक वर्ग को पूरी तरह विशेषाधिकार दे दिए जाएं और दूसरे वर्ग को बिना सुनवाई के अपराधी घोषित कर दिया जाए। महिला सशक्तिकरण के नाम पर आज जिस प्रकार कानूनों का दुरुपयोग हो रहा है, वह न केवल पुरुषों के खिलाफ अन्याय है, बल्कि उन तमाम ईमानदार और संघर्षशील महिलाओं के साथ भी धोखा है जो वाकई वास्तविक उत्पीड़न का शिकार होती हैं। जब झूठे मामलों को संरक्षण मिलने लगता है, तो असली पीड़ितों का न्याय से भरोसा उठ जाता है।
निष्कर्ष
यह समय चुप बैठने का नहीं है। इस भ्रष्ट, अंधी और एकतरफा होती जा रही व्यवस्था के खिलाफ खुलकर बोलने की आवश्यकता है। कानून को जेंडर-न्यूट्रल (लिंग-निरपेक्ष) बनाना होगा, जहाँ अपराध की जांच सबूतों के आधार पर हो, न कि लिंग के आधार पर। यदि समय रहते इस अन्याय और क्रूरता के खिलाफ आवाज नहीं उठाई गई, तो यह तंत्र न केवल पुरुषों का सर्वनाश करेगा, बल्कि पूरे समाज के नैतिक ताने-बाने को हमेशा के लिए चकनाचूर कर देगा। न्याय वही सच्चा है जो सबूतों पर आधारित हो, पूर्वाग्रहों पर नहीं।