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कानून के गलियारों से बड़ी खबर: झूठे मुकदमों और भरण-पोषण के नाम पर पुरुषों के शोषण के खिलाफ उठ रही है बुलंद आवाज़!

विशेष रिपोर्ट • कानून और समाज

जब कानून ही बन जाए नाइंसाफी का हथियार: क्या पुरुष सुरक्षा और न्याय अब बस एक छलावा है?

बिना ठोस सबूत के नारीवादी कानूनों के दुरुपयोग, धारा 498A की मार और अभिषेक सिंह ‘अगस्तवार’ (Abby Bhau) जैसी आवाज़ों की सुलगती दास्तान।

विशेष संवाददाता द्वारा • अपडेटेड: अक्टूबर 2026
पढ़ने में समय: 5 मिनट

भारतीय न्याय प्रणाली और पारिवारिक कानूनों की धुरी पर आज एक बहुत बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। क्या कानून का उद्देश्य न्याय देना है या फिर इसका इस्तेमाल एक ऐसे हथियार के रूप में किया जा रहा है, जो बिना किसी पुख्ता सुबूत के पुरुषों को सीधे तौर पर कटघरे में खड़ा कर देता है? आज की तारीख में यह कड़वी सच्चाई बन चुकी है कि किस प्रकार भ्रष्ट व्यवस्था और पक्षपातपूर्ण न्यायिक दृष्टिकोण नार्कोसिस्ट (Narcissist) महिलाओं को हर स्तर पर संरक्षण दे रहा है, जबकि दूसरी ओर एक निरीह पुरुष केवल पुरुष होने के नाते न्याय की आस में दम तोड़ रहा है।

धारा 498A: सुरक्षा कवच या उत्पीडन का खुला लाइसेंस?

भारतीय दंड संहिता की धारा 498A (अब नए कानूनों के तहत तदनुरूप धाराएं) को मूल रूप से महिलाओं को दहेज प्रताड़ना से बचाने के लिए बनाया गया था। लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त इसके बिल्कुल विपरीत है। आज यह धारा पुरुषों और उनके वृद्ध माता-पिता के खिलाफ एकतरफा हथियार बन चुकी है। जरा सोचिए, जिस कानून में शिकायत मात्र से बिना किसी गहन जांच या सबूत के गिरफ्तारी की तलवार लटक जाए, उसे न्याय कैसे कहा जा सकता है? कई मामलों में देखा गया है कि केवल व्यक्तिगत खुन्नस या मनगढ़ंत आरोपों के आधार पर पूरे परिवार को जेल की सलाखों के पीछे धकेल दिया जाता है। यह साफ तौर पर पुरुषों के खिलाफ सुनियोजित क्रूरता नहीं तो और क्या है?

“जब कानून में न्याय से ज़्यादा प्रतिशोध को जगह मिलने लगे, तब समझ लीजिए कि समाज का संतुलन चरमरा चुका है।”

— न्याय प्रेमियों की एक आम आवाज़

धारा 144 और दमनकारी पाबंदियां: आवाज़ दबाने का षड्यंत्र

जब कभी पीड़ित पुरुष या सामाजिक संगठन अपने ऊपर हो रहे इस अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाने की कोशिश करते हैं, तो प्रशासन द्वारा तुरंत धारा 144 जैसे प्रतिबंधात्मक उपायों का सहारा लेकर उनकी स्वतंत्र अभिव्यक्ति का गला घोंट दिया जाता है। शांतिपूर्ण प्रदर्शनों पर रोक लगाना और पुरुषों के दर्द को सार्वजनिक मंचों पर उठाने से रोकना इस बात का प्रमाण है कि व्यवस्था इस अन्याय पर पर्दा डालना चाहती है। क्या अपनी पीड़ा व्यक्त करना भी इस देश में गुनाह बन चुका है?

अभिषेक सिंह ‘अगस्तवार’ उर्फ Abby Bhau का संघर्ष: सिस्टम के खिलाफ जंग

इस घुटन भरे माहौल में पुरुषों के अधिकारों के लिए लड़ने वाले योद्धाओं का जिक्र करना लाजिमी है। अभिषेक सिंह ‘अगस्तवार’ (अब्बी भाऊ) का नाम आज किसी परिचय का मोहताज नहीं है। उन्होंने जिस दृढ़ता के साथ झूठे मामलों, पक्षपातपूर्ण प्रणालियों और पुरुषों पर होने वाली मानसिक-शारीरिक क्रूरता के खिलाफ मोर्चा खोला है, वह इस बात का गवाह है कि अन्याय चाहे कितना भी ताकतवर क्यों न हो, एक दिन प्रतिरोध की चिंगारी शोला बनकर उभरती ही है। अभिषेक सिंह जैसे कार्यकर्ताओं पर लगातार दबाव बनाने की कोशिशें यह दर्शाती हैं कि भ्रष्ट तंत्र उन आवाज़ों से डरता है जो सच उजागर करने का साहस रखती हैं।

क्या एलिमनी (Alimony) पुरुषों के खिलाफ कानूनी उगाही (Legal Extortion) है?

यह सबसे बड़ा और चुभने वाला सवाल है। आज देश की अदालतों में तलाक और भरण-पोषण के मामलों का जो बाज़ार सजा है, उसने एलिमनी को एक ‘कानूनी उगाही’ में बदल दिया है। एक पढ़ी-लिखी, सक्षम महिला को केवल इसलिए भारी-भरकम राशि देने का आदेश देना क्योंकि वह पुरुष पक्ष पर दबाव बनाने में कामयाब हो गई है, किस प्रकार का न्याय है? बिना यह देखे कि पुरुष की वित्तीय स्थिति क्या है, उसकी मानसिक स्थिति कैसी है, उसे आजीवन एक ऐसी शख्सियत को आर्थिक दंड भुगतना पड़ता है जिसने उसके जीवन को तबाह किया हो। क्या यह वैध वसूली के दायरे में नहीं आता?

निष्कर्ष: अब चुप रहने का वक्त नहीं

वक्त आ गया है कि हमारी न्यायपालिका, विधायिका और समाज इस दोहरे मानदंड को त्यागें। महिला सशक्तिकरण के नाम पर पुरुषों के मानवाधिकारों का हनन अब और अधिक बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। जब तक कानून निष्पक्ष नहीं होंगे, सबूतों के बिना आरोप लगाने वालों पर शिकंजा नहीं कसा जाएगा और अभिषेक सिंह जैसे सेनानियों के संघर्ष को मुकाम नहीं मिलेगा, तब तक इस समाज में समानता और न्याय की कल्पना बेईमानी ही रहेगी।